अररिया में ‘कागजी विकास’ का बड़ा खेल! मनरेगा के 6 करोड़ पर उठे सवाल, जांच की मांग तेज !

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अररिया में ‘कागजी विकास’ का बड़ा खेल: बिना निर्माण डकार गए मनरेगा के 6 करोड़

रिपोर्ट: विनय बिहारी | अररिया (बिहार)

बिहार के अररिया जिले से विकास योजनाओं में बड़े घोटाले की खबर सामने आई है। सिकटी विधानसभा क्षेत्र के कमलदाहा पंचायत में मनरेगा योजना के तहत करोड़ों रुपये के कार्य सिर्फ कागजों पर दिखाकर राशि की निकासी कर लेने का आरोप लगा है।

क्या है पूरा मामला?

ग्रामीणों का आरोप है कि वर्ष 2020 से 2025 के बीच मनरेगा योजना के तहत पुल, पुलिया, सड़क, नहर सफाई और पौधारोपण जैसे कई कार्यों के लिए करीब 6 करोड़ रुपये निकाले गए, लेकिन जमीनी हकीकत बिल्कुल उलट है।

गांव के वार्ड संख्या 1 से 14 तक:

कहीं भी पुल-पुलिया का निर्माण नहीं हुआ
सड़कें सिर्फ कागजों में बनीं
नहर की सफाई नहीं हुई
पौधारोपण का कोई प्रमाण नहीं

ग्रामीणों का कहना है कि “*जमीन पर कुछ भी नहीं है, लेकिन फाइलों में सब पूरा दिखा दिया गया है*।”

RTI से हुआ खुलासा

इस पूरे मामले का खुलासा एक शिकायतकर्ता द्वारा दायर *RTI (सूचना का अधिकार)* आवेदन से हुआ। दस्तावेजों में कई योजनाओं को “पूर्ण” दिखाया गया है, जबकि वास्तविकता में काम शुरू तक नहीं हुआ।

मिलीभगत का आरोप

स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया है कि:

जनप्रतिनिधि
मनरेगा अधिकारी
और संबंधित विभाग के कर्मचारी

सभी की मिलीभगत से यह घोटाला हुआ है। बिना काम कराए ही सरकारी राशि का उठाव कर लिया गया।

मुखिया की सफाई

कमलदाहा पंचायत के मुखिया फिरोज़ ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा:
“मनरेगा के तहत 130 से अधिक प्रकार के कार्य होते हैं। पुल-पुलिया का लेआउट हो चुका है। कुछ काम मौसम के कारण रुके हैं, जिन्हें जल्द पूरा कर लिया जाएगा।”

उन्होंने यह भी कहा कि:

कुछ कार्य पूरे हो चुके हैं (जैसे पोखर और तालाब)
पंचायत का पैसा सरकार के पास लंबित है
आरोप राजनीतिक प्रेरित हैं

बड़ा सवाल: सच कौन बोल रहा है?

एक तरफ ग्रामीण खुलकर विरोध कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर जनप्रतिनिधि सभी आरोपों को नकार रहे हैं।

ऐसे में सबसे बड़ा सवाल उठता है:

क्या वाकई करोड़ों का घोटाला हुआ है?
या फिर यह राजनीतिक विवाद है?

ग्रामीणों ने प्रशासन से निष्पक्ष जांच की मांग की है। उनका कहना है कि:

“अगर एक पंचायत का यह हाल है, तो बाकी पंचायतों की स्थिति क्या होगी?”

निष्कर्ष

यह मामला न सिर्फ विकास योजनाओं की पारदर्शिता पर सवाल उठाता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि जमीनी स्तर पर निगरानी कितनी कमजोर है। अब सबकी नजर प्रशासनिक जांच पर टिकी है।

 

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Author: office

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