महालय के दिन ही दुर्गा पूजा और विसर्जन! आसनसोल के कालीकृष्ण आश्रम की अनोखी परंपरा

पश्चिम बंगाल में दुर्गा पूजा का त्योहार अपनी भव्यता और अनूठी परंपराओं के लिए प्रसिद्ध है। इसी बीच आसनसोल के हीरापुर स्थित धेनुआ गांव में दामोदर नदी के किनारे बने कालीकृष्ण आश्रम की दुर्गा पूजा विशेष आकर्षण का केंद्र है। यहां महालय के दिन ही मां दुर्गा की पूजा शुरू होती है और उसी दिन सप्तमी, अष्टमी, नवमी तथा दशमी की रस्में पूरी करने के बाद प्रतिमा का विसर्जन भी कर दिया जाता है।

जया-विजया की प्रतिमाएं हैं इस पूजा की खास पहचान

कालीकृष्ण आश्रम की दुर्गा पूजा की सबसे खास विशेषता यहां स्थापित प्रतिमाएं हैं। आमतौर पर मां दुर्गा के साथ माता लक्ष्मी, माता सरस्वती, भगवान कार्तिकेय और भगवान गणेश की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। लेकिन इस आश्रम में उनकी जगह मां दुर्गा की दो सखियों जया और विजया की प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। यही विशेषता इस पूजा को अन्य दुर्गा पूजा आयोजनों से अलग पहचान देती है।

महालय पर उमड़ते हैं श्रद्धालु

महालय के दिन होने वाली इस अनूठी पूजा को देखने के लिए आसनसोल सहित आसपास के क्षेत्रों और दूर-दराज से बड़ी संख्या में श्रद्धालु आश्रम पहुंचते हैं। धार्मिक आस्था और वर्षों से चली आ रही परंपरा के कारण यह आयोजन लोगों के बीच विशेष महत्व रखता है।

वर्ष 1937 से जुड़ा है परंपरा का इतिहास

बताया जाता है कि कालीकृष्ण आश्रम की इस अनोखी दुर्गा पूजा की परंपरा वर्ष 1937 में साधक तेजानंद ब्रह्मचारी से जुड़ी है। हालांकि, इस परंपरा की शुरुआत और इसके धार्मिक महत्व से संबंधित विस्तृत ऐतिहासिक तथ्यों की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।

महालय के दिन पूजा से लेकर विसर्जन तक की सभी रस्में पूरी करने वाली यह परंपरा बंगाल की समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत की एक अनूठी झलक प्रस्तुत करती है।