शबे-ए-बारात: रहमत, मग़फिरत और तौबा की रात, मौलाना फैज अहमद अशर्फी क़ादरी से खास बातचीत

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शबे-ए-बारात इस्लामी कैलेंडर के आठवें महीने शाबान की 15वीं रात को मनाई जाती है। अरबी-फ़ारसी शब्दों से बना यह नाम “नजात/मुक्ति की रात” के अर्थ में लिया जाता है। दक्षिण एशिया सहित दुनिया के कई हिस्सों में मुसलमान इस रात को इबादत, दुआ और आत्ममंथन के साथ गुज़ारते हैं।
इस रात को लेकर मान्यता है कि अल्लाह तआला अपनी रहमत के दरवाज़े खोलते हैं, गुनाहों की मग़फिरत करते हैं और आने वाले साल के लिए तक़दीर से जुड़े फ़ैसले लिखे जाते हैं। बहुत से लोग इसे रहमत और बख़्शिश की रात मानते हैं, जब सच्चे दिल से की गई तौबा कबूल होती है। इस पर बिशेष बात हमारे चैनल हेड शौकत खान ने रमजानपुर हैदरी मस्जिद के इमाम मौलाना फैज अहमद अशर्फी क़ादरी खास बात चीत की

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