नई दिल्ली: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बताया कि कंपनियों के लिए एक ऐसा तंत्र मौजूद है जिसके माध्यम से वे अपने खर्च का हिसाब रखने के लिए बाध्य हैं, हालांकि यह प्रक्रिया समय अंतराल के साथ होती है।
उन्होंने कहा कि यदि कंपनियों के पास अप्रयुक्त राशि है और कोई प्रस्ताव लंबित नहीं है, और यह स्थिति कई महीनों तक बनी रहती है, तो कंपनियों को इसे सार्वजनिक रूप से घोषित निधियों में स्थानांतरित करना अनिवार्य है। इस उद्देश्य के लिए कई निधियां सूचीबद्ध हैं।
साथ ही, यदि कोई परियोजना तीन साल के भीतर पूरी नहीं होती है, तो कंपनियों को छह महीने के भीतर उस परियोजना के लिए आवंटित राशि को सार्वजनिक निधियों में ट्रांसफर करना होगा, जिसे व्यापक सामाजिक भलाई के लिए इस्तेमाल किया जा सके।
निर्मला सीतारमण ने बताया कि कंपनियां अंततः परियोजना चयन का निर्णय स्वयं करती हैं, लेकिन सरकार उन्हें कठिन या पिछड़े क्षेत्रों में परियोजनाओं की ओर प्रोत्साहित कर सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि योजना में सूचीबद्ध 12 श्रेणियाँ उन क्षेत्रों की समस्याओं पर केंद्रित हैं जो विकास में पिछड़े हुए हैं, जैसे तेलंगाना, बिहार, बुंदेलखंड और अन्य। इन श्रेणियों में जल प्रबंधन, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्वच्छता जैसे मुद्दे शामिल हैं।
इस प्रकार, योजना की प्रकृति ही कंपनियों को ऐसे क्षेत्रों में निवेश के लिए प्रोत्साहित करती है जो विकासात्मक चुनौतियों का सामना कर रहे हैं।









