नई दिल्ली ; पेट्रोल और डीजल पर केंद्र सरकार द्वारा एक्साइज ड्यूटी में कटौती के फैसले को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है। कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने इस कदम पर सवाल उठाते हुए कहा है कि इससे आम उपभोक्ताओं को सीधे तौर पर कोई राहत नहीं मिलेगी।
उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार का यह फैसला उपभोक्ताओं के हित में नहीं, बल्कि ऑयल मार्केटिंग कंपनियों—जैसे Indian Oil Corporation (IOC), Hindustan Petroleum Corporation Limited (HPCL) और Bharat Petroleum Corporation Limited (BPCL)—को राहत देने के लिए लिया गया है।
श्रीनेत के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी और सप्लाई में बाधाओं के कारण इन कंपनियों के मार्जिन पर दबाव बढ़ रहा था और उनकी अंडर-रिकवरी भी बढ़ रही थी। ऐसे में सरकार ने अपने राजस्व पर असर लेते हुए इन कंपनियों की वित्तीय स्थिति को स्थिर रखने का प्रयास किया है।
उन्होंने यह भी दावा किया कि पिछले 12 वर्षों में नरेंद्र मोदी सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 14 बार बढ़ाई है, जिनमें से अधिकांश वृद्धि विशेष अतिरिक्त शुल्क और सेस के रूप में की गई, जिसे राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाता।
कांग्रेस प्रवक्ता ने आरोप लगाया कि इन बढ़ोतरी के कारण केंद्र सरकार को पेट्रोलियम उत्पादों से लगभग 39 लाख करोड़ रुपये का राजस्व प्राप्त हुआ। उन्होंने तुलना करते हुए कहा कि United Progressive Alliance (यूपीए) सरकार के समय डीजल पर एक्साइज ड्यूटी 3.56 रुपये प्रति लीटर और पेट्रोल पर 9.48 रुपये प्रति लीटर थी, जबकि मौजूदा सरकार में यह अपने उच्चतम स्तर पर क्रमशः 31.83 रुपये और 32.98 रुपये प्रति लीटर तक पहुंच गई।
श्रीनेत ने यह भी आरोप लगाया कि जब वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें कम हुईं, तब सरकार ने उसका लाभ उपभोक्ताओं तक नहीं पहुंचाया और राजस्व बढ़ाने पर ध्यान दिया। उन्होंने मौजूदा फैसले की तुलना ‘ऑयल बॉन्ड’ नीति से करते हुए कहा कि यह कदम भी कंपनियों को राहत देने और कीमतों में अचानक वृद्धि को रोकने के लिए उठाया गया है।
उन्होंने संकेत दिया कि आगामी चुनावों के बाद सरकार की नीति पर नजर रखनी होगी और आशंका जताई कि भविष्य में ईंधन की कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है।










