जो देखता हूँ वही बोलने का आदी हूँ, मैं अपने शहर का सबसे बड़ा फसादी हूँ।”

शाहनवाज हसन

पत्रकारों की एकता और संगठन की मजबूती पर अक्सर सवाल उठते हैं। वरिष्ठ पत्रकार और पत्रकार संगठन से जुड़े रहे एक पदाधिकारी ने इस विषय पर अपनी स्पष्ट राय रखते हुए कहा है कि पत्रकारों के बिखराव का कारण बाहरी ताकतों से अधिक आंतरिक कमजोरियां हैं।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2010-11 में एक महिला पत्रकार के साथ कथित अन्याय के खिलाफ शुरू हुए आंदोलन ने पत्रकार संगठन निर्माण की नींव रखी। सीमित संसाधनों और कम लोगों के साथ शुरू हुई इस लड़ाई ने कई मौकों पर पत्रकारों को न्याय दिलाने का काम किया। बाद में पत्रकार संजीव द्विवेदी के खिलाफ दर्ज मामले के विरोध से संगठन को और मजबूती मिली और झारखंड जर्नलिस्ट एसोसिएशन (JJA) का गठन हुआ।

लेख में दावा किया गया है कि संगठन ने पत्रकारों की गिरफ्तारी, हमले, झूठे मुकदमों, आर्थिक सहायता और न्यायिक लड़ाइयों में सक्रिय भूमिका निभाई। साथ ही यह आरोप भी लगाया गया है कि कुछ लोगों ने व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा, पदलोलुपता और स्वार्थ के कारण पत्रकार संगठनों को कमजोर करने का प्रयास किया।

लेखक का मानना है कि पत्रकारों की सबसे बड़ी समस्या यह है कि कई लोग संगठन को दायित्व की बजाय पद और प्रतिष्ठा का माध्यम समझते हैं। पत्रकारों पर हमले होने पर भी अक्सर व्यापक एकजुटता देखने को नहीं मिलती।

उन्होंने कहा कि संगठन किसी एक व्यक्ति से बड़ा होता है। व्यक्ति आते-जाते रहते हैं, लेकिन उद्देश्य और संघर्ष जारी रहने चाहिए। उनके अनुसार पत्रकारों के अधिकार, सुरक्षा और सम्मान की लड़ाई भविष्य में भी जारी रहेगी।

लेख के अंत में उन्होंने कहा कि सत्य का मार्ग कठिन जरूर होता है, लेकिन अंततः वही आत्मसम्मान और स्थायी संतोष प्रदान करता है

 शाहनवाज हसन